गुमसुम निस्पंद हुआ जीवन, मंडराना भूल गया है मन;
जाने ये कैसी चली पवन, खुशियों को ले गई दूर गगन.
फिरता था पहले चमन-चमन, अपने ही धुन में मस्त मगन;
क्या दिन थे वे भी मनभावन, सुख के अम्बर पर सूर्यकिरण.
क्यूँ नहीं चपल अब ये चितवन, किसलिए बंधा है मेरा तन;
जानू न मरम मैं हे भगवन, बोलो कुछ, तोड़ो मौन वरण.
अब सह नहीं सकता और दमन, दीवारों की ये ठंडी जलन;
बस, हुआ बहुत, अलविदा घुटन, ऐ सूर्य कहाँ है, दे दर्शन.
इतने दिवसों का अर्ध-मरण, सिखा गया मुझको ये फन;
जीवन नहीं कोई दिवा-स्वपन, हो जहाँ पुष्प की सेज मदन.
जीवन है एक निरंतर रन, बाधा-विघ्नों का वन ये सघन;
भेद इसे सकते वो नयन, हो जिनमें जीत की सच्ची लगन.
फिर मुझमें कैसे आई ये थकन, मैं तो मनु-कुल का कुलभूषण;
ईश्वर ने किया जिसका चंदन, जीतूँगा मैं, है मेरा प्रण.
ये धरा करेगी अभिनंदन, जिस पर पग रख करूँगा विचरण;
दिनकर दौडेगा करने नमन, पूछता, कहाँ थे, कहो अमन…
No comments:
Post a Comment