क्यूँ धरा उज्जवल सी है, इस घनेरी रात में
उस चाँद के संग कोटि दीपक भी सजे बारात में
तम् का ठिकाना अब कहाँ, बस ज्योति हरसूं है भरी
अज्ञान तिमिरांध मानव, उठ कृपा-बरसात में..
रात्रि का श्रृंगार, शशि, अब नही शीतल रहा
ठान ली इसने बगावत, है अनल धधक उठा.
कवि के कलम की बाँध, इसकी अब सीमा नहीं
प्रियतमा से न द्वेष इसको, उन्मुक्त तम् से लड़ रहा..
चंद्र औ रवि ने किया आलोकित अहर्निश व्योम को
मांग उनसे अग्नि थोडी, कर प्रकाशित स्वयं को
उसकी लौ में हो फना, तेरे लिए हैं वो खड़े
हर पल सवेरा, खोल चक्षु, जान ले उस शक्ति को..
उसकी कृपा है देखो की संग अगणित तारे जल उठे
जाग मानव, छोड़ आलस, फ़िर ऐसी दया रहे ना रहे
सूरजमुखी भी त्याग गुंचा, निकली चंद्रालोक में
फिर हे सर्वोत्तम कृति, तू सबसे पीछे क्यूँ रहे????
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