ज़िन्दगी दौड़ रही है और हम थम गए हैं...
दिन ब-दिन अरमान भी कुछ कम गए हैं..
ख्वाहिश नहीं की चाँद तारे तोड़ लायें...
खुद के ही नूर-ए-पाक में हम रम गए हैं...
Thursday, November 11, 2010
Tuesday, March 30, 2010
मैं कागज़ काले करता हूँ ......
बैठ अकेले नदी किनारे, क्या क्या सोचा करता हूँ
और न जाने कब तक कितने कागज़ काले करता हूँ
लिखकर अपने मन की बातों को जब वापस पढता हूँ
फाड़ उसी कागज़ को मैं पानी में फेंका करता हूँ ।
ना जाने कितने पन्नों को ऐसे मैंने बर्बाद किया
जाने कितनी शीशी स्याही, नद्नीर में यूँ हुमाद किया
उन्माद कहूँ क्या कैसा ये, ये हाथ नहीं थकते मेरे
कोरे कागज़ पे स्याह चलाने, फिर से कलम पकड़ता हूँ ।
मैं कागज़ काले करता हूँ ।
और न जाने कब तक कितने कागज़ काले करता हूँ
लिखकर अपने मन की बातों को जब वापस पढता हूँ
फाड़ उसी कागज़ को मैं पानी में फेंका करता हूँ ।
ना जाने कितने पन्नों को ऐसे मैंने बर्बाद किया
जाने कितनी शीशी स्याही, नद्नीर में यूँ हुमाद किया
उन्माद कहूँ क्या कैसा ये, ये हाथ नहीं थकते मेरे
कोरे कागज़ पे स्याह चलाने, फिर से कलम पकड़ता हूँ ।
मैं कागज़ काले करता हूँ ।
अकेला
हूँ अकेला भीड़ में, चलता जिधर को पग निकलते
और मैं चलता ही जाता, रास्ते जब तलक चलते
मील के पत्थर जो छूटे, राह पर क़दमों के पीछे
मुस्कुरा करके कहा सबने, चला चल तू अकेला .
आँख में मंजिल न कोई, ना कोई सपना ही मेरा
ठौर भी है नहीं जिसको, कह सकूँ अपना बसेरा
जाऊं भी तो जाऊं मैं किस ओर, कोई ये बता दे
दुनिया झूठी सच न इसमें, चार दिन का बस झमेला .
और बंधन तो न थे, बस एक तुझमें मन रमा था
मुझ अकेले को तेरे आने से एक साथी मिला था
बांह पकड़ी तूने मेरी, लगा कुछ ना शेष जग में
प्यार हरसूं और हर पल एक मधुर रस प्रेम-बेला .
चाहता था संग तेरा, तुझे ईश्वर मानता था
हर घडी हर पल तेरी आराधना में कानता था
साथी पर जाने हुआ क्या, बांह तुने यूँ झटक दी
मानो निवाले का मैं कीड़ा, टूटा अरमानों का मेला .
खैर साथी शुक्रिया तेरा मिली अब राह मुझको
जाना ईश्वर ही है मेरा, अब वहीँ जाना है मुझको
देखो मुझसे कह रहे वो, छोड़ सब कर मुझसे प्रीति
मैं हूँ तेरा, तू है मेरा, कौन कहता तू अकेला .
उनका दिया ये दिल, कहो उनके सिवा किसमें लगाऊं
दुनिया है एक स्वप्न झूठा, झूठ में सुख कैसे पाऊं
भेद बतलाने ये साथी तुम गुरु बन के थे आये
जीवन समर्पित अब तुम्हे, फिर मैं कैसे कब अकेला .
और मैं चलता ही जाता, रास्ते जब तलक चलते
मील के पत्थर जो छूटे, राह पर क़दमों के पीछे
मुस्कुरा करके कहा सबने, चला चल तू अकेला .
आँख में मंजिल न कोई, ना कोई सपना ही मेरा
ठौर भी है नहीं जिसको, कह सकूँ अपना बसेरा
जाऊं भी तो जाऊं मैं किस ओर, कोई ये बता दे
दुनिया झूठी सच न इसमें, चार दिन का बस झमेला .
और बंधन तो न थे, बस एक तुझमें मन रमा था
मुझ अकेले को तेरे आने से एक साथी मिला था
बांह पकड़ी तूने मेरी, लगा कुछ ना शेष जग में
प्यार हरसूं और हर पल एक मधुर रस प्रेम-बेला .
चाहता था संग तेरा, तुझे ईश्वर मानता था
हर घडी हर पल तेरी आराधना में कानता था
साथी पर जाने हुआ क्या, बांह तुने यूँ झटक दी
मानो निवाले का मैं कीड़ा, टूटा अरमानों का मेला .
खैर साथी शुक्रिया तेरा मिली अब राह मुझको
जाना ईश्वर ही है मेरा, अब वहीँ जाना है मुझको
देखो मुझसे कह रहे वो, छोड़ सब कर मुझसे प्रीति
मैं हूँ तेरा, तू है मेरा, कौन कहता तू अकेला .
उनका दिया ये दिल, कहो उनके सिवा किसमें लगाऊं
दुनिया है एक स्वप्न झूठा, झूठ में सुख कैसे पाऊं
भेद बतलाने ये साथी तुम गुरु बन के थे आये
जीवन समर्पित अब तुम्हे, फिर मैं कैसे कब अकेला .
Friday, May 8, 2009
शायद अब आ जाए साकी तो तरस
शायद अब आ जाए साकी को तरस
दो बूँद ही दे जा, नहीं माँगू कलश।
आस में की मिलती तेरी इक झलक
धूप में चलता रहा हूँ अब तलक
नैन दोनों खो चुके हैं नीर अपने
होंठ भी है सुर्ख, मरुभूमि से नीरस।
शायद अब आ जाए साकी को तरस......
बीता जीवन सूखे कंटीले रास्तों पर
रह गए बादल सभी केवल गरज कर
ओट में छुपती रही मंजिल हमेशा
किंतु मैं बढ़ता रहा, हो निश-दिवस।
शायद अब आ जाए साकी को तरस......
मंजिल तो ना मिली पर मिल गया साकी
जाम दे ऐसी, रहे न चाह बाँकी
हूँ अकेला एक तेरा ही भरोसा
आ भी जा की साँस कुछ बाँकी है बस।
शायद अब आ जाए साकी तो तरस......
जीवन मेरा, कैसे कहूँ, सचमुच है मेरा
मेरी कभी चली नहीं, बस चला तेरा
है सत्य तू ही, जान ले ये रूह मेरी
कर दे सवेरा, दिखा जा एक दरस।
शायद अब आ जाए साकी को तरस......
दो बूँद ही दे जा, नहीं माँगू कलश।
आस में की मिलती तेरी इक झलक
धूप में चलता रहा हूँ अब तलक
नैन दोनों खो चुके हैं नीर अपने
होंठ भी है सुर्ख, मरुभूमि से नीरस।
शायद अब आ जाए साकी को तरस......
बीता जीवन सूखे कंटीले रास्तों पर
रह गए बादल सभी केवल गरज कर
ओट में छुपती रही मंजिल हमेशा
किंतु मैं बढ़ता रहा, हो निश-दिवस।
शायद अब आ जाए साकी को तरस......
मंजिल तो ना मिली पर मिल गया साकी
जाम दे ऐसी, रहे न चाह बाँकी
हूँ अकेला एक तेरा ही भरोसा
आ भी जा की साँस कुछ बाँकी है बस।
शायद अब आ जाए साकी तो तरस......
जीवन मेरा, कैसे कहूँ, सचमुच है मेरा
मेरी कभी चली नहीं, बस चला तेरा
है सत्य तू ही, जान ले ये रूह मेरी
कर दे सवेरा, दिखा जा एक दरस।
शायद अब आ जाए साकी को तरस......
Wednesday, April 8, 2009
अकेला सही
लाऊं कहाँ से ढूँढ के अपना हमनवां
अपने हर इक ख़याल से टकरा चुका हूँ मैं
कैसे ढूँढ लूँ इस राह पे और इक साथी
ख़ुद अपने ही दिल से मात खा चुका हूँ मैं .......ख्वाहिश तो थी कोई समझता मेरे भी दिल को
हाय अब अपनी समझ गवाँ चुका हूँ मैं ........भटका बहुत, खोया रहा ताउम्र राहों में
शायद अब, मंजिल का पता पा चुका हूँ मैं ........दुनिया नहीं, है हदीसे-पाक हकीकत
झूठ छोड़ सच की ओर आ चुका हूँ मैं ........
होगा जो करम उनका, मिलेंगे वो इक दिन
अकेला सही, अपने कदम बढ़ा चुका हूँ मैं ........Monday, January 5, 2009
झूठा लहरों का प्रमाद
गहरा सागर कहता तट से
मैं हूँ इस जीवन का सार
शांत, मंद, गतिहीन, चिर-स्थिर
प्रेम सुधा रस अमृत धार.
नदिया झरने निर्झर सारे
पा जाते मुझमें विश्राम
जीवन पथ पर जूझ जूझ कर
ही मिलता है अन्तिम धाम.
तट की मौजें कुछ ना सुनती
कहती लहरें - 'आराम नहीं'
हर पल नूतन जीवन मेरा
मुझमे अंत की चाह कहीं?
सागर तुम मृतकों का आश्रय
मैं हूँ जीवन धुन का साज
नित्य प्रभंजन मेरा कहता
कैसे रोकूँ ख़ुद को आज.
लहरों से ही सीखा मैंने
आगे बढ़ते रहना प्रतिपल
हर मंजिल पा जाने पर
अगले मंजिल की चाह प्रबल.
अंत-हीन इस भाग-दौड़ में
पीछे मैं और आगे मन
हर पल मुझको खींचे जैसे
डब्बों को खीचे इंजन.
बुद्धि कहती ओ निर्बुद्धि
एक बार बस कहना मान
मन है एक निरंकुश चालक
इसकी सीमा आसमान.
ले लगाम अपने हाथों में
मन को तू हथियार बना
चिर-विश्रांति लक्ष्य हो तेरा
उसके साधन में जुट जा.
कहती बुद्धि सागर है सच
झूठा लहरों का प्रमाद
मोह-मुक्त, ना दुःख सुख कोई
हार-जीत ना हर्ष-विषाद.
ईश-अंश तो तू है ही
अब अंश-पूर्ण का भेद मिटा
परम शक्ति में एकीकृत हो
तू भी परम-ब्रम्ह बन जा.
मैं हूँ इस जीवन का सार
शांत, मंद, गतिहीन, चिर-स्थिर
प्रेम सुधा रस अमृत धार.
नदिया झरने निर्झर सारे
पा जाते मुझमें विश्राम
जीवन पथ पर जूझ जूझ कर
ही मिलता है अन्तिम धाम.
तट की मौजें कुछ ना सुनती
कहती लहरें - 'आराम नहीं'
हर पल नूतन जीवन मेरा
मुझमे अंत की चाह कहीं?
सागर तुम मृतकों का आश्रय
मैं हूँ जीवन धुन का साज
नित्य प्रभंजन मेरा कहता
कैसे रोकूँ ख़ुद को आज.
लहरों से ही सीखा मैंने
आगे बढ़ते रहना प्रतिपल
हर मंजिल पा जाने पर
अगले मंजिल की चाह प्रबल.
अंत-हीन इस भाग-दौड़ में
पीछे मैं और आगे मन
हर पल मुझको खींचे जैसे
डब्बों को खीचे इंजन.
बुद्धि कहती ओ निर्बुद्धि
एक बार बस कहना मान
मन है एक निरंकुश चालक
इसकी सीमा आसमान.
ले लगाम अपने हाथों में
मन को तू हथियार बना
चिर-विश्रांति लक्ष्य हो तेरा
उसके साधन में जुट जा.
कहती बुद्धि सागर है सच
झूठा लहरों का प्रमाद
मोह-मुक्त, ना दुःख सुख कोई
हार-जीत ना हर्ष-विषाद.
ईश-अंश तो तू है ही
अब अंश-पूर्ण का भेद मिटा
परम शक्ति में एकीकृत हो
तू भी परम-ब्रम्ह बन जा.
Wednesday, November 5, 2008
कैसे रोकूँ ख़ुद को आज
गहरा सागर कहता तट से
मैं हूँ इस जीवन का सार
शांत, मंद, गतिहीन, चिर-स्थिर
प्रेम सुधा रस अमृत धार.
नदियाँ झरने निर्झर सारे
पा जाते मुझमे विश्राम
जीवन पथ पर जूझ जूझ कर
ही मिलता है अन्तिम धाम.
तट की मौजे कुछ न सुनती
कहती लहरें - 'आराम नहीं'
हर पल नूतन जीवन मेरा
मुझमें अंत की चाह कहीं?
सागर तुम मृतकों का आश्रय
मैं हूँ जीवन धुन का साज
नित्य प्रभंजन मेरा कहता
कैसे रोकूँ ख़ुद को आज.
मैं हूँ इस जीवन का सार
शांत, मंद, गतिहीन, चिर-स्थिर
प्रेम सुधा रस अमृत धार.
नदियाँ झरने निर्झर सारे
पा जाते मुझमे विश्राम
जीवन पथ पर जूझ जूझ कर
ही मिलता है अन्तिम धाम.
तट की मौजे कुछ न सुनती
कहती लहरें - 'आराम नहीं'
हर पल नूतन जीवन मेरा
मुझमें अंत की चाह कहीं?
सागर तुम मृतकों का आश्रय
मैं हूँ जीवन धुन का साज
नित्य प्रभंजन मेरा कहता
कैसे रोकूँ ख़ुद को आज.
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