Tuesday, March 30, 2010

मैं कागज़ काले करता हूँ ......

बैठ अकेले नदी किनारे, क्या क्या सोचा करता हूँ
और न जाने कब तक कितने कागज़ काले करता हूँ
लिखकर अपने मन की बातों को जब वापस पढता हूँ
फाड़ उसी कागज़ को मैं पानी में फेंका करता हूँ ।

ना जाने कितने पन्नों को ऐसे मैंने बर्बाद किया
जाने कितनी शीशी स्याही, नद्नीर में यूँ हुमाद किया
उन्माद कहूँ क्या कैसा ये, ये हाथ नहीं थकते मेरे
कोरे कागज़ पे स्याह चलाने, फिर से कलम पकड़ता हूँ ।
मैं कागज़ काले करता हूँ ।

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