हूँ अकेला भीड़ में, चलता जिधर को पग निकलते
और मैं चलता ही जाता, रास्ते जब तलक चलते
मील के पत्थर जो छूटे, राह पर क़दमों के पीछे
मुस्कुरा करके कहा सबने, चला चल तू अकेला .
आँख में मंजिल न कोई, ना कोई सपना ही मेरा
ठौर भी है नहीं जिसको, कह सकूँ अपना बसेरा
जाऊं भी तो जाऊं मैं किस ओर, कोई ये बता दे
दुनिया झूठी सच न इसमें, चार दिन का बस झमेला .
और बंधन तो न थे, बस एक तुझमें मन रमा था
मुझ अकेले को तेरे आने से एक साथी मिला था
बांह पकड़ी तूने मेरी, लगा कुछ ना शेष जग में
प्यार हरसूं और हर पल एक मधुर रस प्रेम-बेला .
चाहता था संग तेरा, तुझे ईश्वर मानता था
हर घडी हर पल तेरी आराधना में कानता था
साथी पर जाने हुआ क्या, बांह तुने यूँ झटक दी
मानो निवाले का मैं कीड़ा, टूटा अरमानों का मेला .
खैर साथी शुक्रिया तेरा मिली अब राह मुझको
जाना ईश्वर ही है मेरा, अब वहीँ जाना है मुझको
देखो मुझसे कह रहे वो, छोड़ सब कर मुझसे प्रीति
मैं हूँ तेरा, तू है मेरा, कौन कहता तू अकेला .
उनका दिया ये दिल, कहो उनके सिवा किसमें लगाऊं
दुनिया है एक स्वप्न झूठा, झूठ में सुख कैसे पाऊं
भेद बतलाने ये साथी तुम गुरु बन के थे आये
जीवन समर्पित अब तुम्हे, फिर मैं कैसे कब अकेला .
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