Wednesday, November 5, 2008

कैसे रोकूँ ख़ुद को आज

गहरा सागर कहता तट से
मैं हूँ इस जीवन का सार
शांत, मंद, गतिहीन, चिर-स्थिर
प्रेम सुधा रस अमृत धार.

नदियाँ झरने निर्झर सारे
पा जाते मुझमे विश्राम
जीवन पथ पर जूझ जूझ कर
ही मिलता है अन्तिम धाम.

तट की मौजे कुछ न सुनती
कहती लहरें - 'आराम नहीं'
हर पल नूतन जीवन मेरा
मुझमें अंत की चाह कहीं?

सागर तुम मृतकों का आश्रय
मैं हूँ जीवन धुन का साज
नित्य प्रभंजन मेरा कहता
कैसे रोकूँ ख़ुद को आज.

1 comment:

nandan said...

its to good aman...