शायद योग की एक परिभाषा
'चित्त की वृत्तियों का निरोध' भी है।
गीता में स्थितप्रज्ञ और वीतराग
को ही मुक्ति का अधिकारी कहा गया है।
तो क्यों न ऐसा योगी बना जाये ?
पर गीता में यह भी लिखा है कि
मानव तन का संस्कार से परे होना संभव नहीं।
मन का निर्विचार होना भी दुस्साध्य है।
परिस्थितियों से अप्रभावित, निर्विकार,
'दुःख सुख में सम' फिर कैसे रहें ?
पर सोचो ये लड़ाई ही क्यूँ ?
मुक्ति में ऐसा क्या है ?
यह भव-बंधन क्या कष्टों का ही बंधन है ?
इस चक्कर से निकलने की ख्वाहिश ही क्यूँ ?
और फिर क्या यह भी एक 'इच्छा-मात्र' नहीं ?
क्या अंतस की सहज प्रकृति 'निर्लिप्त' रहना ही है ?
फिर क्या शरीर में बंधी आत्मा सज़ा-याफ़्ता नहीं ?
अगर है तो क्या जेल तोड़कर भागने की इच्छा
हमें पुनः अपराधी नहीं बनाती ?
तन संस्कार छोड़ नहीं सकता, आत्मा वृत्तियों से अछूती है
फिर ऐसे विपरीत गुण वाले तन को आत्मा से जोड़ा ही क्यों गया ?
क्या ईश्वर ने आत्माओं को दर्ज़ों में बाँट रखा है
जिसमें ऊपर वाले मुक्त और नीचे वालों को जेल होती है ?
फिर क्या वो परमात्मा भी विभेदों को नहीं पाल रहा ?
और बिना समत्व के क्या वो खुद मुक्त है ?
शायद मुक्त वही है जिसे इन प्रश्नों के उत्तर की जरुरत ही नहीं।
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