Sunday, September 7, 2014

 टूटा फूल कनैल का 

अभी अभी तो नींद खुली थी
चारों तरफ हरी डाली थी
और थे पत्ते , लम्बे , पतले
मुझे सहेजे , गोद में रखके

झुरमुट की फुनगी पर मैं था
अंतर मेरा मृदु रसमय था
हवा महकती झूम के बोली
'स्वागत', मैंने पंखुरियाँ खोली ।

मैंने देखा वो पेड़ बड़ा था
जिसके शीर्ष पे मैं  खड़ा था
भूरे तनें , हरे पत्ते थे
सबपे पीले फूल लगे थे ।

हाँ फर्श पे भी कुछ फुल पड़े थे
शायद  ऊपर से ही गिरे थे
तभी हवा का झोंका आया
कुछ फूलों को तोड़ गिराया ।

देख के मंज़र मैं सहमा था
तभी इक भँवरे ने चूमा था
मेरे मीठे रस में चिर-द्युत
हाय, स्पर्श कितना था अद्भुत ।

वो उड़ा, मैं अब सूखा था
फिर से आओ, मैं चीखा था
अब वो नहीं, बस झोंका आया
फुनगी से टूटी मेरी काया ।

क्षण में अंतिम पथ पर आया
प्राणहीन, रो भी न पाया
गिरा, कुछ पंखुरियाँ टूटी
चारों तरफ थी केवल मिट्टी ।

ऊपर दृश्य वही, बस मैं मृत
बस मैं अपने अंत से व्यथित
फूल भी उतने, पेड़ वही था
रत्ती भर न फर्क पड़ा था ।

कितना क्षण-भंगुर है जीवन
पल भर बचपन, पल भर यौवन
अंत मगर सबका निश्चित है
पर तू इससे क्यों विचलित है ।

खुशबू और खुशियां फैलाओ
झूमो, महको, हँसो, हँसाओ
दो पल ही जीना हो, तो क्या
कुछ तो अच्छा कर के जाओ ।

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