Thursday, November 11, 2010

ज़िन्दगी दौड़ रही है और हम थम गए हैं...
दिन ब-दिन अरमान भी कुछ कम गए हैं..
ख्वाहिश नहीं की चाँद तारे तोड़ लायें...
खुद के ही नूर-ए-पाक में हम रम गए हैं...