Friday, May 8, 2009

शायद अब आ जाए साकी तो तरस

शायद अब आ जाए साकी को तरस
दो बूँद ही दे जा, नहीं माँगू कलश

आस में की मिलती तेरी इक झलक
धूप में चलता रहा हूँ अब तलक
नैन दोनों खो चुके हैं नीर अपने
होंठ भी है सुर्ख, मरुभूमि से नीरस
शायद अब आ जाए साकी को तरस......

बीता जीवन सूखे कंटीले रास्तों पर
रह गए बादल सभी केवल गरज कर
ओट में छुपती रही मंजिल हमेशा
किंतु मैं बढ़ता रहा, हो निश-दिवस।
शायद अब आ जाए साकी को तरस......

मंजिल तो ना मिली पर मिल गया साकी
जाम दे ऐसी, रहे न चाह बाँकी
हूँ अकेला एक तेरा ही भरोसा
आ भी जा की साँस कुछ बाँकी है बस
शायद अब आ जाए साकी तो तरस......

जीवन मेरा, कैसे कहूँ, सचमुच है मेरा
मेरी कभी चली नहीं, बस चला तेरा
है सत्य तू ही, जान ले ये रूह मेरी
कर दे सवेरा, दिखा जा एक दरस।
शायद अब आ जाए साकी को तरस......