लाऊं कहाँ से ढूँढ के अपना हमनवां
अपने हर इक ख़याल से टकरा चुका हूँ मैं
कैसे ढूँढ लूँ इस राह पे और इक साथी
ख़ुद अपने ही दिल से मात खा चुका हूँ मैं .......ख्वाहिश तो थी कोई समझता मेरे भी दिल को
हाय अब अपनी समझ गवाँ चुका हूँ मैं ........भटका बहुत, खोया रहा ताउम्र राहों में
शायद अब, मंजिल का पता पा चुका हूँ मैं ........दुनिया नहीं, है हदीसे-पाक हकीकत
झूठ छोड़ सच की ओर आ चुका हूँ मैं ........
होगा जो करम उनका, मिलेंगे वो इक दिन
अकेला सही, अपने कदम बढ़ा चुका हूँ मैं ........