Monday, January 5, 2009

झूठा लहरों का प्रमाद

गहरा सागर कहता तट से
मैं हूँ इस जीवन का सार
शांत, मंद, गतिहीन, चिर-स्थिर
प्रेम सुधा रस अमृत धार.

नदिया झरने निर्झर सारे
पा जाते मुझमें विश्राम
जीवन पथ पर जूझ जूझ कर
ही मिलता है अन्तिम धाम.

तट की मौजें कुछ ना सुनती
कहती लहरें - 'आराम नहीं'
हर पल नूतन जीवन मेरा
मुझमे अंत की चाह कहीं?

सागर तुम मृतकों का आश्रय
मैं हूँ जीवन धुन का साज
नित्य प्रभंजन मेरा कहता
कैसे रोकूँ ख़ुद को आज.

लहरों से ही सीखा मैंने
आगे बढ़ते रहना प्रतिपल
हर मंजिल पा जाने पर
अगले मंजिल की चाह प्रबल.

अंत-हीन इस भाग-दौड़ में
पीछे मैं और आगे मन
हर पल मुझको खींचे जैसे
डब्बों को खीचे इंजन.

बुद्धि कहती ओ निर्बुद्धि
एक बार बस कहना मान
मन है एक निरंकुश चालक
इसकी सीमा आसमान.

ले लगाम अपने हाथों में
मन को तू हथियार बना
चिर-विश्रांति लक्ष्य हो तेरा
उसके साधन में जुट जा.

कहती बुद्धि सागर है सच
झूठा लहरों का प्रमाद
मोह-मुक्त, ना दुःख सुख कोई
हार-जीत ना हर्ष-विषाद.

ईश-अंश तो तू है ही
अब अंश-पूर्ण का भेद मिटा
परम शक्ति में एकीकृत हो
तू भी परम-ब्रम्ह बन जा.